उमर का और प्रतिभा का सगा नाता नहीं कोई |
हमेशा दर्द गाता है आदमी गाता नहीं कोई ||
सियासत के प्रवक्ता रोज़ लय सुर ताल बदलेंगे,
कहीं चेहरा कहीं चिंतन कहीं पे चाल बदलेंगे |
कभी पगड़ी बदल लेंगे कभी रूमाल बदलेंगे,
मिले कुर्सी तो अपनी वल्दियत हर साल बदलेंगे ||
कहीं ऐसा ना हो धैर्य के हिमखंड गल जाएँ,
सहज शालीनता के स्वर शरारों मे बदल जाएँ |
जिन्हें विद्वेष वन्दे-मातरम से है,
हमारे गाँव की सीमा से खुद बाहर निकल जाएँ ||
या बदचलन हवाओं का रुख मोड़ देंगे हम,
या खुद तो वाणीपुत्र कहना छोड़ देंगे हम |
जिस दिन भी हिचकिचाएंगे लिखने में हकीक़त,
कागज़ को फाड़ देंगे कलम को तोड़ देंगे हम ||
Monday, September 28, 2009
Sunday, September 27, 2009
भूख और कला
भूख की कुटनी कला की कुलवधू को,
नग्नता की हाट में बिठला रही है|
फिर कहीं से दर्द के सिक्के मिलेंगे,
ये हथेली आज फिर खुजला रही है ||
-शिवओम अम्बर
नग्नता की हाट में बिठला रही है|
फिर कहीं से दर्द के सिक्के मिलेंगे,
ये हथेली आज फिर खुजला रही है ||
-शिवओम अम्बर
खुद्दारी
समय ने जब भी अंधेरों से दोस्ती की है,
जला के अपना ही घर हमने रौशनी की है |
सुबूत है मेरे घर में धुँए के ये धब्बे,
अभी अभी यहाँ पे उजालों ने खुदकुशी की है ||
-गोपाल दास नीरज़
जला के अपना ही घर हमने रौशनी की है |
सुबूत है मेरे घर में धुँए के ये धब्बे,
अभी अभी यहाँ पे उजालों ने खुदकुशी की है ||
-गोपाल दास नीरज़
नंदन जी
वांची तो थी मैंने खंडहरों में लिखी हुई इबारत,
लेकिन मुमकिन कहाँ था उतना उस वक़्त ज्यों का त्यों याद रखना |
और अब लगता है कि बच नहीं सकता मेरा भी इतिहास बन जाना,
कि वांचा तो जाऊंगा पर जी नहीं पाउँगा ||
नदी कि कहानी कभी फिर सुनाना, मैं प्यासा हूँ दो घूंट पानी पिलाना|
मुझे वो मिलेगी ये मुझको यकीं हैं, बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना ||
मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था, भंवर देखना कूदना डूब जाना |
ये तनहाईयाँ-याद भी-चाँद भी, गज़ब का वजन है संभल के उठाना ||
नदी कि कहानी कभी फिर सुनाना, मैं प्यासा हूँ दो घूंट पानी पिलाना|
लेकिन मुमकिन कहाँ था उतना उस वक़्त ज्यों का त्यों याद रखना |
और अब लगता है कि बच नहीं सकता मेरा भी इतिहास बन जाना,
कि वांचा तो जाऊंगा पर जी नहीं पाउँगा ||
नदी कि कहानी कभी फिर सुनाना, मैं प्यासा हूँ दो घूंट पानी पिलाना|
मुझे वो मिलेगी ये मुझको यकीं हैं, बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना ||
मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था, भंवर देखना कूदना डूब जाना |
ये तनहाईयाँ-याद भी-चाँद भी, गज़ब का वजन है संभल के उठाना ||
नदी कि कहानी कभी फिर सुनाना, मैं प्यासा हूँ दो घूंट पानी पिलाना|
Saturday, September 26, 2009
गुलजार की नज्में
आदतन तुमने कर दिए वादे, आदतन हमने ऐतबार किया |
तेरी राहों में बाराहा रुक कर, हमने अपना ही इंतज़ार किया |
अब ना मांगेंगे ज़िन्दगी या रब, ये गुनाह हमने एक बार किया ||
क्या बताएं कि जान गयी कैसे, फिर से दोहराएँ वो घडी कैसे |
किसने रास्ते में रखा था चाँद, मुझको वहां ठोकर लगी कैसे ||
-गुलजार
तेरी राहों में बाराहा रुक कर, हमने अपना ही इंतज़ार किया |
अब ना मांगेंगे ज़िन्दगी या रब, ये गुनाह हमने एक बार किया ||
क्या बताएं कि जान गयी कैसे, फिर से दोहराएँ वो घडी कैसे |
किसने रास्ते में रखा था चाँद, मुझको वहां ठोकर लगी कैसे ||
-गुलजार
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